माघ मेला में कुम्भ मे जाने वाले यात्रियों और निराश्रितों को हमने “ओढ़ा दी जिंदगी” – सारिका।

वाराणसी- सर्दियां जब आती है तो अमीरों के लिए यह एक खुशनुमा मौसम होता है पर धमनियों के बहने वाले रक्त को जमा देने वाली ठंड अभावग्रस्त लोगों के लिए अपार पीड़ा लाती है। हर साल सरकार के लाखों प्रयासों के बावजूद भी ठंढ से मृत्यु की खबर आत्मा को झकझोर देती है। आम जनमानस की समस्या के प्रति संवेदनशील रहने वाली संस्था “खुशी की उड़ान” ने अपनी मुहिम “उड़ा दो जिंदगी” के तहत वाराणसी रेलवे स्टेशन पर सड़क के किनारे सोने वाले वह भिक्षा मांग कर जीवन यापन करने वाले बुजुर्गों,दिव्यांगों, रिक्शा चालकों एवं निराश्रितों के मध्य कंबल वितरण का कार्य किया, साथ ही रात के अंधेरे में ठंढ से कापते बच्चों और निराश्रितों को ढूंढ कर उन्हे कम्बल ओढ़ाया।

वही स्टेशन पर सेवा दे रहे पुलिस कर्मियों और गार्ड का कहना था कीय्ह् जहां आज के आधुनिक युग में एक तरफ युवा तरुणाई पर संवेदनशील होने का प्रश्न चिन्ह लगता जा रहा है वहीं दूसरी तरफ “खुशी की उड़ान” के युवा है जो इस बात को गलत साबित करते हैं, और इस कड़ाके की ठंड में अर्ध रात्रि को निकलकर संस्था की महिला टीम जरूरतमंदों को चयनित कर मौके पर जाकर उनको कंबल उड़ा रही हैं।

यह एक मार्मिक और हृदय स्पर्शी दृश्य रहा मेरे लिए, क्युकी कुंभ में जाने वाले ऐसे बहुत से यात्री हैं ट्रेन ना मिल पाने की वजह से इस कड़कती ठंड में खुले आसमान के नीचे रात बितानी पड़ रही है जिनको इस कंबल से यह रात काटना आसान हो जाएगा ।
संस्था प्रतिवर्ष ठंड में जरूरतमंद बच्चों बुजुर्गों और दिव्यांगों के मध्य गर्म कपड़े और कंबल वितरण का कार्यक्रम करती आ रही है।
संस्था की संस्थापिका सारिका दुबे ने कहा की संस्था का यह सेवा कार्य तथा संस्था के मुहिम “ओढ़ा दो जिंदगी” अनवरत चलती रहेगी, हम ईश्वर से यह प्रार्थना करते हैं कि वह हमें इतना सामर्थवान बनाएं कि हम ऐसे जरूरतमंदों की सेवा और ज्यादा बढ़ चढ़कर करते रहे।
वरिष्ठ सदस्य प्रदीप जायसवाल जी ने कहाँ की जरूरतमंदों को कम्बल देने के बाड़ उनके चेहरे पर आई मुस्कान और उनके द्वारा दिया गया आशीर्वाद से मन को आत्मिक सुख की प्राप्ति हुई,साथ ही उन्होंने कहाँ की हम अपनी तरफ से ऐसे पुनीत कार्य सदैव करते रहेंगे।
इस सेवा कार्य में संस्था के कोषाध्यक्ष चीतेश्वर सेठ,आकाश पाण्डेय, राहुल पाण्डेय उपस्थिति समेत सभी ने जरूरतमंदों को ओढ़ाया “कंबल का संबल”।
