वाराणसी. सनातन परंपरा के महापर्व होली को लेकर काशी के विद्वानों और ज्योतिषाचार्यों ने शास्त्रसम्मत तिथियों की औपचारिक घोषणा कर दी है. तिथियों के फेर और भद्रा काल के प्रभाव को देखते हुए गहन गणना और विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च की मध्यरात्रि में किया जाएगा, जबकि रंगों का उत्सव 4 मार्च को मनाया जाएगा.
बीएचयू के ज्योतिष विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष ज्योतिषाचार्य प्रो रामचंद्र पाण्डेय जी ने शास्त्रीय प्रमाणों का हवाला देते हुए बताया कि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा 2 मार्च की शाम 5:56 बजे से आरंभ होकर 3 मार्च की शाम 5:08 बजे तक रहेगी. यद्यपि 2 मार्चको भद्रा का प्रभाव रहेगा, तथापि लोकाचार और धर्मशास्त्रीय मयार्दाओं के समन्वय से रात्रि 11:57 बजे के बाद का समय होलिका दहन के लिए श्रेठ माना गया है. उन्होंने कहा कि होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि धर्म, दर्शन और सामाजिक समरसता का प्रतीक पर्व है. विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के अनुसार शास्त्रों में ‘भद्रायां द्वे न कर्तव्यें का सिद्धांत वर्णित है, जिसके तहत भद्र काल में दहन वर्जित माना जाता है. किंतु विशेष परिस्थितियों में भद्रा के ‘पुच्छ’ भाग में कार्य करना शुभ फलदायी माना गया है. इसी आधार पर मध्यरात्रि का समय उपयुक्त ठहराया गया. धर्मशास्त्रों के अनुसार होलिका दहन उसी रात्रि को मान्य होता है, जब पूर्णिमा तिथि व्याप्त हो. इस वर्ष 2 मार्च को पूर्णिमा के साथ भन्द्र का भी संयोग है. धर्मसिंधु के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए उन्होंन स्पष्ट किया कि यदि भद्रा पूरी रात्रि व्याप्त हो, तो उसके मुख भाग का त्याग कर दहन किया जा सकता है. उन्होंने गणना के आधार पर बताया कि भद्र का मुख भाग तड़के 2:03 बजे से 4:03 बजे तक रहेगा, अतः उससे पूर्व दहन संपन्न करना शास्त्रोचित होगा.
वहीं श्री काशी विश्वनाथ मंदिर
न्यास के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर नागेंद्र पडिय ने भी मुहूर्त की पुष्टि करते हुए कहा कि 2 मार्च की रात्रि 11:57 बजे से 1:15 बजे तक ‘भद्रा पुच्छ’ काल रहेगा. ज्योतिष शास्त्र में भद्रा के पुच्छ भाग को कार्यसिद्धि और शुभफल प्रदान करने वाला माना गया है. अतः इसी अवधि में होलिका दहन सर्वाधिक कल्याणकारी रहेगा. रंगोत्सव के विषय में विद्वानों ने एकमत से कहा कि 3 मार्च को सूर्योदय पूर्णिमा तिथि में होगा, इसलिए प्रतिपदा तिथि 4 मार्च को प्रभावी रहेगी. शास्त्रानुसार प्रतिपदा में ही धूलेंडी और रंगों की होली मनाई जाती है. अतः 4 मार्च, बुधवार को रंगोत्सव मनाना पूर्णतः शास्त्रसम्मत रहेगा. काशी के विद्वानों की इस सर्वसम्मत घोषणा से होली की तिथियों को लेकर बना संशय समाप्त हो गया है. अब श्रद्धालु और आयोजक शास्त्रसम्मत गणना के आधार पर महापर्व की तैयारियों में जुट सकते है.
